प्रतीक्षा

-:काल:-

ज्योत्सना

प्रतिद्वन्दिनी की

गायत्र आँखों पर

से उतरकर

उनींदी बेचैनी का

कर रही सामना |

-:स्वयं से संवाद:-

मैं क्यों अधीर

कुम्हला जाती हूँ |

रवि बेचारा

रोज दोपहरी सेना लेकर

रजनी रजनी करता फिरता है

और उसके आने के पहले

थककर वापस सो जाता है |

तब इठलाती रजनी आकर

पवन के झोंके साथ मे लाकर

धीरे से उसकी आँखों पर

शीत बूँदें बरसा जाती है |

प्रातः अगले दिन वो उठता

लाल आँखों को मलता मलता

क्या जाने वह अनजाने में

रजनी के सपनों को हरता |

रोज फिर वही दिवा-संग्राम

ढूंढता रहता कण कण में वो

रजनी के आने का प्रमाण |

-:काल:-

मधुर – मधुरिमा – मनोरमा

मन – मादक – नव्योत्सना

पवन – प्रकृती – प्रणयोत्तमा

प्रकृती – शांत्योपासना |

-:दर्शक:-

एक कमलिनी

कमल प्रदीप

के प्रकाश में

होठों पर

मुस्कान लेकर

करवट करवट

बदल रही है |

लगी टकटकी

अदृश्य द्वार पर

जहाँ खड़ीं है

माला लेकर

अदृश्य चेतना |

-:स्वयं से संवाद:-

हार जो जाऊं

माला लेकर

हरिद्वार पर

तो हे हरि तुम

संबल देना |

कि बांसुरी की

धुन में ही मैं

खो जाऊं इस तरह कि मेरा

मूल रोम सब कुछ मिट जाए

फिर जब कभी बांसुरी बजेगी

मिल जायेगा मेरा प्रमाण

राधेश्याम राधेश्याम |

-:काल:-

समग्र सरिता

सरस संसार

सतत सीधी

शीतल धार|

-:दर्शक:-

डाले दृष्टी जब कोई

शब्दहीन इस सृष्टी पर

खो देगा वो ज्ञान चेतना

सम्मोहन के वृष्टी पर |

-:स्वयं से संवाद:-

प्रेम पछोड़ यमुना का छोर

बांसुरी धुनता वो चितचोर

पीहू पीहू कोकिल सम्वृत्ती

करती फिरू मैं हो विभोर |

-:दर्शक:-

ज्ञान चेतना की सीमा पर

उसकी भी निस्पंदन सीमा

फिर से मुझको हर जाती है |

-:उपसंहार:-

-:दर्शक:-

नहीं पता मैं क्या क्या भूला

नहीं पता मैं क्या क्या जाना

नहीं चेतना नहीं सृष्टी है

नहीं ज्ञान और नहीं दृष्टी है |

लक्ष्य न मेरा

दिशा न मेरी

शेष न कोई वांछा है |

रहूँ सदा मैं इसी घाट पर

इसी कर्म में इसी भूमि पर |

आयेगा यम तब करूँगा विनती

ले जा मुझको पर एक शर्त

अगला जन्म अगर मैं लू तो

इसी घाट पर इसी भूमि पर

हरित वृक्ष मैं बन जाऊं |

-:काल:-

आज पड़ा मिटटी का ढेर

उसी जगह वाल्मिक वेश में |

समीपस्थ है एक खँडहर

वहां कोई बैठा करती है

आँखों में सपने बुनती है

वही वही चिरातीत आग्रह

वही वही अनश्वर प्रतीक्षा |

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